logo

OccultSetu

Blog

MNREGA से VB Gram G तक: जब कल्याण धर्म से हटकर व्यवस्था को बिगाड़ने लगे

By Acharya Lokesh

December 25, 2025

MNREGA से VB Gram G तक: जब कल्याण धर्म से हटकर व्यवस्था को बिगाड़ने लगे

ग्रामीण भारत, श्रम और नीति संतुलन की चुनौती

भारत की सामाजिक–आर्थिक संरचना मूलतः कृषि आधारित रही है और आज भी है। गाँव, खेत, मजदूर और मौसम—ये केवल आर्थिक इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) हैं। भारतीय परंपरा में शासन का उद्देश्य इस तंत्र को संतुलन में रखना था, न कि उसे कृत्रिम सहारों से बिगाड़ देना।

MNREGA का प्रारंभिक उद्देश्य और परिवर्तन

MNREGA की शुरुआत एक मानवीय और करुणामय सोच के साथ हुई थी। इसका उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को न्यूनतम आय सुरक्षा देना और संकट के समय उन्हें सहारा देना था। प्रारंभिक वर्षों में इस योजना ने राहत दी, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन समय के साथ MNREGA एक सहायता तंत्र से अधिकार तंत्र बनती चली गई—और यहीं से समस्याएँ शुरू हुईं।

ग्रामीण श्रम संस्कृति पर प्रभाव

सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा ग्रामीण श्रम संस्कृति पर। जब बिना उत्पादकता के, अपेक्षाकृत आसान काम पर नियमित भुगतान मिलने लगा, तो श्रमिक वर्ग में धीरे-धीरे आत्मसंतोष और निष्क्रियता बढ़ने लगी। खेतों में काम कठिन है—मौसम पर निर्भर, शारीरिक श्रम वाला और अनिश्चित। इसके मुकाबले MNREGA का काम अधिक सुरक्षित, निश्चित और कम जोखिम वाला लगा। परिणामस्वरूप, कृषि कार्यों के लिए मजदूरों की उपलब्धता कम होती चली गई। यह समस्या केवल मजदूरों की नहीं थी, बल्कि पूरे कृषि तंत्र की थी। किसान समय पर मजदूर नहीं पा सके, खेती की लागत बढ़ी, और कृषि उत्पादन पर दबाव पड़ा। निजी क्षेत्र में मिलने वाली मजदूरी की तुलना MNREGA की मजदूरी से होने लगी, जिससे प्राकृतिक मजदूरी संतुलन बिगड़ गया। यह एक ऐसा हस्तक्षेप था, जिसने बाज़ार और प्रकृति—दोनों के नियमों को चुनौती दी।

मुफ्त राशन और श्रम मूल्य

इस असंतुलन को और गहरा किया मुफ़्त राशन जैसी योजनाओं ने। भोजन जैसी बुनियादी आवश्यकता का पूर्णतः मुफ्त हो जाना, बिना किसी उत्पादक योगदान के, श्रम के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को कमजोर करता है। जब पेट भी भर जाए और काम के लिए दबाव भी न हो, तो शारीरिक श्रम का मूल्य धीरे-धीरे गिरने लगता है। यह करुणा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रूप से अधर्मजन्य दया बन जाती है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण: शनि और बृहस्पति का संतुलन

ज्योतिष की भाषा में देखें तो यह पूरा परिदृश्य शनि की विकृत स्थिति को दर्शाता है। शनि श्रम, अनुशासन और कर्म का ग्रह है। वह श्रमिक का रक्षक है, लेकिन वह चाहता है कि श्रम का फल समाज के लिए कुछ स्थायी रचे। जब मेहनत और परिणाम के बीच संबंध टूट जाता है, तब शनि दंडात्मक हो जाता है—भ्रष्टाचार, अकुशलता और असंतोष के रूप में। यहीं बृहस्पति का अभाव स्पष्ट दिखता है। बृहस्पति विवेक, नीति और दूरदृष्टि का ग्रह है। MNREGA जैसे मॉडल में शनि तो था—काम और पैसा—लेकिन बृहस्पति का मार्गदर्शन कमजोर रहा। न तो परिसंपत्ति निर्माण पर पर्याप्त ध्यान दिया गया, न ही यह सोचा गया कि इसका प्रभाव कृषि, निजी रोजगार और श्रम संस्कृति पर क्या पड़ेगा।

भगवद्गीता का संदेश

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं—
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"
, Bhagavad Gita 2.47
अर्थात कर्म करो, लेकिन फल की आसक्ति में मत उलझो। इसका अर्थ यह नहीं कि कर्म और फल का संबंध ही तोड़ दिया जाए। शासन का धर्म यह है कि वह कर्म को प्रोत्साहित करे, लेकिन उसे फलहीन या अर्थहीन न बनाए।

VB Gram G: एक नया दृष्टिकोण

इसी संदर्भ में VB Gram G जैसे पुनर्गठन को देखा जाना चाहिए। यह केवल नाम बदलने का प्रयास नहीं है, बल्कि एक संकेत है कि शासन अब कल्याण को राहत से आगे बढ़ाकर निर्माण और अनुशासन से जोड़ना चाहता है। यदि यह मॉडल वास्तव में परिसंपत्ति निर्माण, गाँव की ज़रूरतों और उत्पादक श्रम पर केंद्रित होता है, तो यह शनि को बृहस्पति का मार्गदर्शन देने जैसा होगा। राजा जनक का उदाहरण गीता में इसलिए दिया गया है क्योंकि उन्होंने लोककल्याण को आलस्य या मुफ्त व्यवस्था से नहीं, बल्कि कर्तव्य और अनुशासन से जोड़ा। सच्चा नेतृत्व जनता को आराम का आदी नहीं बनाता, बल्कि उन्हें सक्षम बनाता है।

निष्कर्ष

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि योजनाएँ कितनी लोकप्रिय हैं। प्रश्न यह है कि वे समाज को मजबूत कर रही हैं या कमजोर। भारत जैसे देश में, जहाँ कृषि और श्रम जीवन का आधार हैं, वहाँ नीति का हर निर्णय इस पारिस्थितिकी को ध्यान में रखकर होना चाहिए। OccultSetu पर हम मानते हैं कि ज्योतिष भविष्य बताने से अधिक नीतियों के कर्मफल को समझने का माध्यम है। जब शनि अनुशासन से हटता है और बृहस्पति विवेक नहीं देता, तब व्यवस्था बिगड़ती है। लेकिन जब दोनों संतुलन में हों, तभी राष्ट्र स्थायी रूप से आगे बढ़ता है। क्योंकि अंततः, शनि हिसाब रखता है—और बृहस्पति तय करता है कि वह हिसाब धर्म का है या नहीं।